Sunday, July 24, 2011

          उम्मीद 


 आज उसने खुद को  पाया 
ज़िन्दगी के उस किनारे ;
जिस किनारे वो अकेला बस खड़ा था 
ज़िन्दगी से जो भी पाया 
कुछ समेटीं यादें उसने और समेटे ख्वाब सारे ;
आज उसने खुद को पाया ज़िन्दगी के उस किनारे |

वो बहुत खुश है कि उसने जीत ली उम्मीद अपनी 
वो बहुत खुश है कि उसने पार कि देहलीज़ अपनी ;
अपनी आँखों में है देखी ज़िन्दगी उन्मुक्त अपनी 
अपनी यादों को बनाया आदतन ताबीज़ अपनी |

ज़िन्दगी का साथ पकडे , ज़िन्दगी के पार है वो 
अपनी धुन में गीत गाता , अपना ही विस्तार है वो ;
स्वर भी अपनी ज़िन्दगी के ,खुद चुने हैं आज उसने 
अपनी सभी गहराईयों का , आखिरी आसार है वो |

डर नहीं है आज उसके दिल में बस कुछ प्यार है 
है वो बस अनजान आखिर कौन वो हकदार है ;
क्या वो उसकी ज़िन्दगी है, या कि अपने लोग हैं !
प्यार से सींचा है उसने , आप अपने प्यार को 
प्यार पर उसने सजाया , प्यार का संसार है |

मुश्किलों से लहरों ने , उससे कहा कुछ कान में ,
लहरों  ने गोता लगाया , कुछ समय तक डूबकर ;
फिर वो अपने गोद में कुछ ढूंड लाईं आप ही 
एक हसीन तोहफा दिया , बोला ये वो हकदार है ;
जिसपे तेरी ज़िन्दगी है , जिससे तेरा प्यार है |


                                                                    - प्रत्यूष  त्रिपाठी   "आशियाँ"      

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